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क्या वाकई लॉकडाउन में भूख की वजह से हुई मीना मरांडी की मौत?

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ऊपर से नीचे: मीना मरांडी की फाइल फोटो , मीना मरांडी का घर , मीना के माता-पिता

अनुराधा सिंह की रिपोर्ट

झारखंड, बोकारो के गोमिया प्रखंड के टीकाहारा गांव में 17 साल की युवती, मीना मरांडी की मौत का मामला सामने आया है। जन्म से ही दिव्यांग युवती के माता-पिता का आरोप है कि उनकी बेटी की मौत लॉकडाउन की वजह से इलाज एवं खाना नहीं मिल पाने की वजह से हुई है। हालांकि प्रशासन इस बात से इनकार कर रहा है। गोमिया के सर्किल ऑफिसर ओमप्रकाश मंडल ने फोन पर बताया, ” यह सरासर गलत है। युवती की मौत भूख एवं इलाज के आभाव में नहीं हुई है। जिसने अफवाह फैलाने की कोशिश की है उसे चिन्हित कर उसके खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई है।”

वहीं गोमिया के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि प्रशासन ने झूठे आरोप तय कर इस मुद्दे को उठाने वाले शख्स पर FIR दर्ज कराई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी आरोप है कि प्रशासन ने जीतन मरांडी और उनकी पत्नी शांति देवी पर दबाव बनाकर उनके अंगूठों के निशान ले लिये हैं जिससे यह साबित हो सके कि मीना मरांडी की मौत भूख से नहीं हुई।

मीना जन्म से ही दिव्यांग थी। मीना की मां बताती हैं “  हमारी बेटी ना चल सकती थी, ना हाथ हिला सकती थी, ना बोल सकती थी ना ही खुद खाना सकती थी। जब से जन्म लिया उसने अपने हाथों से कभी खाना नहीं खाया। हम पति-पत्नी ही उसे अपने हाथ से खाना खिलाते थे।”

मीना अपने माता- पिता की मदद से ही सभी दैनिक कर्म कर पाती थीं।

मीना के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। उन्होंने बताया कि मजदूरी करके वह रोजाना 100-200 रुपये कमाते हैं। साथ ही राज्य सरकार द्वारा मीना को दिये जाने वाले दिव्यांग पेंशन से भी उन्हें थोड़ी बहुत मदद मिल जाती थी। उन्होंने यह भी बताया कि  पेंशन नियमित तौर पर नहीं मिलता था। उन्हें यह भी नहीं पता है कि सरकार द्वारा मीना को दिव्यांग पेंशन के रूप में कितनी राशी मिलती थी। उन्होंने बताया कि बैंक जाने पर 3-4 महिनों में एक बार उन्हें 2000 से 3000 रुपये मिलते थे।

मीना के पिता ने बताया कि वह अपनी पत्नी एवं बेटी के साथ हरका पत्थर, रामगढ़ में रहते थे। 24 तारीख को लॉकडाउन के बाद वह परिवार सहित अपने गांव टीकाहारा (बोकारो) लौट आये। उसके बाद से ही मीना की तबीयत बिगड़ने लगी थी। 7 अप्रैल देर रात मीना की मृत्यु हो गई।

गरीबीं, भूख और बेटी की मौत ने मीना की मां को संवेदनशुन्य बना दिया। वह बिना किसी भाव के बताती हैं , ” बंदी की वजह से मीना को अस्पताल नहीं ले जाए पाए। वहां (रामगढ) रहते तो कुछ उपाय भी हो जाता। यहां गांव में कुछ नहीं हो पाया। वहां दिन भर मजदूरी करके जैसे-तैसे गुजर-बसर कर लेते थे कुछ कमा भी लेते थे मगर यहां आए तो हमारे पासो कुछ भी नहीं था पैसे भी नहीं। हां घर में मक्का था कुछ उसको देगची में कूट कर पीस देते थे। फिर वही खाते थे। मीना को भी वही खिलाते थे। कभी-कभी तो हम सब लोग बस पानी पीकर भूख मिटाने की कोशिश करते।20-21डेसिमल जमीन है मगर खेती करने के लिए पैसा कहां से लाएं! राशन कार्ड भी नहीं बना है हमारा।” (संथाली भाषा से हिंदी में अनुवादित बयान)

वीडियो में दिवंगत मीना मरांडी का घर देखें

 

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