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गोद में बच्चा, सिर पर गठरी और निकल पड़ी

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अनुराधा सिंह की रिपोर्ट

“यहां पराया के बीच रहकर मरने से तो अच्छा है अपना लोग के बीच मरें, अपना माएट (मिट्टी) में। वहां मां है बाप है समाज है। ”

गोद में डेढ साल का बच्चा, सिर पर सामान से भरा बैग लिए लगभग 25-26 साल की रानी ने जल्दी- जल्दी चलते हुए, हांफते हुए बताया।

रानी आगे कहती है, “ खाना नहीं है, बच्चा का दूध नहीं है, इनका( पति) काम भी बंद हो गया है। मकान मालिक को बोले हमलोग, नहीं माना बोला हमको भी तो पैसा चाहिये। मेरा बच्चा कहां से खाएगा। तो का करें हमलोग आप ही बताओ ”।

बलिया की रहने वाली रानी दिल्ली के कौशांबी में अपने पति एवं डेढ साल के बेटे आयुष के साथ किराये के मकान में रहती है। रानी के जैसी हजारों की संख्या में महिलाएं दिल्ली यूपी बॉर्डर पर चली जा रही हैं। किसी के साथ पति है ,परिवार के बाकि के सदस्य हैं तो कोई जान- पहचान के लोगों के साथ झुंड में चली जा रही है।

महाराजपुर ,गाजियाबाद में रहने वाली अलीगढ़ की ममता ने बताया कि उसके पति गांव गए थे शनिवार को, सोमवार को वापस लौट आने की बात कहकर। मगर रविवार को लॉकडाउन के बाद वो वहीं रह गए। ममता ने कहा कि वह जल्द से जल्द अपने पति के पास पहुंचना चाहती है। उसने बताया कि वह डर रही है कि अगर उसे कोरोना हो गया तो उसे और उसके 8 साल के बेटे का यहां क्या होगा। ऐसी कई महिलाएं हैं जिनके पति कहीं बाहर हैं और वह अपने घर परिवार के पास जल्द से जल्द सुरक्षित पहंच जाना चाहती हैं सो जान पहचान एवं पड़ोसियों के साथ वह भी इस झुंड का हिस्सा बन चल पड़ी हैं।

खाने-पीने का थोड़ा बहुत तो इन्होंने इंतजाम कर रखा है है मगर जितनी दूर का सफर इन्हें तय करना है उसके लिए वह पर्याप्त नहीं मालूम पड़ा। हां कुछ स्वयंसेवी संस्था के लोग कहीं खाना तो कहीं बिस्किट बांटते जरूर दिखे।

एक और परेशानी जिसका सामना खास तौर पर इन महिलाओं को करना पड़ सकता है वह मासिक धर्म । एक महिला से जब इस बाबत बात की तो उसने कहा,” हड़बड़ी में निकल पड़े, कहां पैड वैड खरीदते। कपड़ा है काम चला लेंगे । “

नीभा जो कि गोपालगंज,बिहार की रहने वाली है उसका 4 साल का बेटा उल्टियां करता दिखा। पूछने पर बताती है,” यहां खोड़ा में रहते हैं हमलोग। ये (पति) फैक्ट्री में करते हैं। बंद हो गया फैक्ट्री। मालिक बोला पता नहीं कब खुलेगा। तो इसलिए जा रहे हैं गांव अपने। बेटा का कल से ही तबीयत खराब है। आज तो उल्टी भी हो रहा सुबह निकले उसका थोड़ा देर बाद से ही। लेकिन क्या करें यहां रह नहीं सकते। सब बोल रहा कुछ दिन में खाना- पानी मिलना भी बंद हो जाएगा। गांव बात हुआ है, वहां ऐसा नहीं है। “

हजारों की भीड़ में लोग अपने परिवार के साथ दिल्ली- उत्तरप्रदेश बॉर्डर पर चले जा रहे हैं। कोरोना वायरस के बढते संक्रमण को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 मार्च 2020, रात बारह बजे से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की थी। उसके बाद से ही देश भर से दिहाड़ी मजदूर अपने परिवार के साथ अपने-अपने गृह राज्य के लिए निकल गए। यातायात व्यवस्था बंद होने के कारण सभी पैदल ही सड़क के रास्ते निकल पड़े हैं।

महिलाएं हैं, बुजुर्ग हैं, छोटे बच्चे हैं। हजारों मीलों का सफर तय कर उन्हें हर हाल में अपने घर पहुंचने की जल्दी है। सरकार एवं प्रशासन के बार-बार कहने के बाद भी वो कुछ मानने को तैयार नहीं दिख रहे।

इंदिरापुरम थाने के सब इंस्पेक्टर, शादाब ने बताया, “ गाजियाबाद के कौशांबी से अलग-अलग जगहों के लिए 40 बसें चलाई गई हैं। और बसें चलाई जाएंगी ताकि लोगों को कोई परेशानी न हो। प्रशाशन पूरी मुस्तैदी से काम कर रही है । ”

इधर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि दिल्ली सरकार द्वारा 100 बसों का इंतजाम किया गया है जो विभिन्न राज्यों के लिए चलाई जाएंगी। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने दो सौ बसें चलाने की बात कही है।

गौर करने वाली बात यह है कि जब हजारों की संख्या में इतने लोग एक साथ झुंड में चल रहे हैं जहां कोई भी सामाजिक अलगाव के नियमों का पालन नहीं हो रहा ऐसे में जब यह लोग अपने-अपने जिले कस्बों में पहुंचेगें तब राज्य सरकारें किस तरह से उनकी मेडिकल जांच कर पाएंगी और कैसे इतने लोगों को क्वारंटाइन कर पाएंगे !

यह नजारा सिर्फ दिल्ली व यूपी बॉर्डर का ही नहीं है। हरियाणा दिल्ली एवं अन्य प्रदेशों के बॉर्डर पर भी कमोबेश यही हालात हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पंजाब सभी राज्यों से लोग अपने गृह राज्य पहुंचना चाह रहे हैं। अब बड़ा सवाल है कि जिस प्रकार लॉक डाउन का उल्लंघन हो रहा है उसमें हम असली लड़ाई से कहीं भटक ना जाएं। कोरोना को हराने के लिए लॉकडाउन का पालन हर हाल में करना पड़ेगा। सरकारें कह रही हैं कि सबके लिए इंतजाम किया जा रहा है लेकिन कहीं ना कहीं सारा सिस्टम फेल होता नजर आ रहा है। अचानक हुए ल़ॉक डाउन के कारण जहां तहां लोग फंसे हुए हैं और उनके पास कोई चारा नहीं है।

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